असुर: वेब सीरीज़ रिव्यू




दुत्कार, मानव समाज की प्रथम प्रतिक्रिया होती है, जब उनकी मान्यताओं पर प्रहार किया जाए. फिर चाहे वो प्रहार उनके स्वयं के हित के लिए ही क्यों न हो. क्योंकि सामान्य मनुष्य का सीमित  ज्ञान उसे स्वयं से परे देखने नहीं देता. फिर चाहे वो मानव जीवन हो, वास्तुक्रिया या नए विचार. ब्रह्मांड में नवजीवन का सिंचन, पुराने खंडहरों की राख से ही जन्म लेता है. अश्रु, रक्त, पीड़ा, निराशा. एक साधारण मनुष्य इस मार्ग पर चलकर अजेय बन सकता है. क्योंकि विचारों की आयु मानव जीवन से कहीं अधिक है.म के ओटीटी (स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म) पर स्ट्रीम हो रही है. हर एपिसोड पौने घंटे का है. सिर्फ़ लास्ट वाले को छोड़कर, जो एक घंटे से कुछ लंबा है.

इसे लिखा गौरव शुक्ला, विनय चावला और निरेन भट्ट ने है. डायरेक्ट किया है ओणी सेन ने.

# कहानी-

कहानी तीन किरदारों के इर्द-गिर्द बुनी गई है-

1) 15 साल पहले, बनारस के एक पंडित का बच्चा, शुभ. जिसको उसका बाप ‘असुर’ पुकारता है. दुत्कारता है. क्योंकि एक तो उसके पैदा होते ही उसकी मां मर जाती है. दूसरा वो उस नक्षत्र में पैदा नहीं होता, जिसकी उसके पिता को उम्मीद थी. हालांकि इस बच्चे का आईक्यू बहुत ही तेज़ है, लेकिन बड़े होकर ये सीरियल किलर बन जाता है. अव्वल तो अपने ‘ट्रबल्ड पास्ट’ के चलते और साथ ही इसने शास्त्रों, वेदों को पढ़कर अपनी एक अजब सी आइडियोलॉजी बना ली है.

2) निखिल नायर, जो पहले सीबीआई की फ़ोरेंसिक टीम में काम करता था, लेकिन अब अमेरिका में पढ़ाता है. इसे वापस इंडिया आना पड़ता है. क्योंकि कोई है, जो इसे इंडिया वापस बुला रहा है. एक ट्रैप बुन रहा है.

3) डॉक्टर धनंजय राजपूत, जो सीबीआई की फ़ोरेंसिक टीम में टॉप पोस्ट पर है. लेकिन पहले ही एपिसोड में अपनी पत्नी, संध्या के क़त्ल के इल्ज़ाम में जेल पहुंच जाता है.

दर्शकों को ‘असुर’ यानी कहानी के मेन विलेन का सिर्फ़ बचपन ही पता है. अब, यानी बड़े होकर ये असुर कौन है, यही कहानी का सस्पेंस है. साथ में सवाल और भी हैं 

 

इन सवालों को ढूंढने के दौरान ज़्यादातर टाइम इस वेब सीरीज़ की स्क्रिप्ट दर्शकों से दो क़दम आगे रहती है. और अगर आप कोई सस्पेंस गेस कर भी लेते हैं, तो वो भी इसलिए क्योंकि सीरीज़ के निर्माता ऐसा चाहते हैं.द से बिलकुल अलहदा रहता है.

# इंट्रेस्टिंग बात ये है कि सीरीज़ कई जगहों पर ‘लॉ ऑफ़ कर्मा’ की बात करती है, लेकिन अपने क्लाइमैक्स में नैतिक होने का या जस्टिस करने का लोड नहीं लेती. और यूं, अगर सस्पेंस को छोड़ भी दिया जाए, तो भी एक यूनिक सी एंडिग देखने को मिलती है. होने को इस एंडिंग को आप इस सीरीज़ के अगले सीज़न का क्लिफहैंगर भी कह सकते हैं, लेकिन कई मायनों में ये अपने आप में भी पूर्ण है. कुछ-कुछ ब्रेड पिट की मूवी ‘सेवन’ सरीखी. (माइनस जस्टिस)

और इन सब चीज़ों के चलते लास्ट वाले एपिसोड का नाम भी, ’एंड इज दी बिगनिंग’ काफ़ी सटीक लगता है.

# यही ‘नैतिक’ न होने वाला पॉइंट, दोनों नायकों को ग्रे शेड देता है, वास्तविक बनाता है. जैसे, जहां डॉक्टर धनंजय राजपूत एक अपराधी को सज़ा दिलवाने के लिए फ़र्ज़ी डॉक्यूमेंट्स बनाता है. वहीं निखिल का किरदार अपने परिवार की ख़ातिर, खलनायक के हाथ का हथियार बन जाता है.

# कुछ नेगेटिव तो ख़ैर हम डिस्क्स करेंगे ही, लेकिन ये बात नेगेटिव नहीं इस सीरीज़ की एक और अच्छी बात है. कि अगर ये सीरीज़ कहीं-कहीं आपको किसी थ्रिलर मूवी/नॉवल से इंस्पायर्ड लगे भी, तो वो यक़ीनन कुछ बेहतरीन थ्रिलर्स से लगेगी. जैसे इसकी ट्विस्टेड फ़िलॉसफ़ी आपको अनुराग कश्यप की मूवी ‘नो स्मोकिंग’, किदार शर्मा की ‘चित्रलेखा’ या हॉलीवुड साई-फ़ाई ‘मैट्रिक्स’ की याद दिला सकती है. बिना स्पॉइलर के बताएं तो आपको विलेन का ‘एकवचन से बहुवचन’ हो जाना, ‘फ़ाइट क्लब’ मूवी में फ़ाइट क्लब के मेंबर्स भी याद दिलाता है- 

 

# ‘असुर’ की कुछ बेहतरीन चीज़ों में शामिल है, किरदारों की एक्टिंग. ‘मुन्नाभाई’ की कॉमेडी, उसके बाद ‘धमाल’ और ‘पागलपंती’ के छिछोरेपन के बाद आपको अरशद वारसी का ‘असुर’ वाला ‘नो नॉनसेंस’ लुक भी देखना चाहिए. आपको लगेलर्म एक ही पाले में थे. 

 

सोचिए, विलेन इतना शातिर और हाई आईक्यू वाला है कि मुश्किल से मुश्किल जगह जाकर कत्ल कर देता है. विदेश में रह रहे बंदे को ट्रैप कर लेता है. लेकिन इतना सब होने के बावजूद मर्डर करने के आडियाज़ दूसरे किरदार से मांगता है.

# कहानी बहुत ज़्यादा ‘पुरुष प्रधान’ है. नैना लीड की बीवी है और मेन प्लॉट में उसका रोल सिर्फ़ एक फ़ायरवॉल सिक्यूरिटी तोड़कर खानापूर्ति भर कर देने का है. बाक़ी समय उसका काम निखिल से ग़ुस्सा रहना है. नैना का किरदार अनुप्रिया गोयंका ने निभाया है.

यही हाल सीबीआई में काम करने वाली नुसरत सईद का भी है, जो एक ‘प्रेमिका’ भर लगती है और अपने पुराने प्रेमी को सोशल मीडिया पर स्टॉक करती है. ये किरदार रिद्धि डोगरा ने प्ले किया है. तब जबकि एक वसे सीरियल किलिंग को इंवेस्टिगेट कर रही टीम का हेड बना दिया जाता है, फिर भी वो कहीं नेपथ्य में ही दिखाई देती है. अधिकतर.

इन दोनों की ही एक्टिंग अच्छी है. हमने इनकी चर्चा भी अलग से इसलिए की, ताकि ये बात प्रॉमिनेंट हो सके. क्योंकि रिव्यू करते वक़्त हमें ये बात बेतरह खटकती रही.

# स्टोरी डेवलपमेंट में एक्शन के बदले नरेशन को ज़्यादा भाव दिया लगता है. ये एक ऑडियो विजुआल कंटेंट की सबसे बड़ी ख़ामी ठहरी. इस सीरीज़ में दर्शन भी नरेशन के माध्यम से ही इंजेक्ट किया गया है.

# अंततः

ऊपर की सभी आलोचनाओं के बावजूद ये कहने में क़तई संकोच नहीं है कि ‘असुर’ हिंदी में बनी कुछ बेहतरीन वेब सीरीज़ में से एक है. साथ ही ऊपर जो आलोचनाएं हमने की हैं, वो भी इस सीरीज़ को बहुत ज़्यादा हार्ड मार्किंग देने पर ही उभर कर आती हैं.

इसलिए हम अंत में यही कहेंगे कि अगर आपको वेब सीरीज़ का चस्का है या फिर नहीं भी है, पर ‘सेक्रेड गेम्स’ और ‘मिर्ज़ापुर’ जैसी सीरीज़ मिस नहीं की हैं, तो ‘असुर’ भी मिस मत कीजिएगा.