मेड इन हैवन: रईसों की शादियों के कौन से घिनौने सच दिखा रही है ये सीरीज़?

  

ख़ूबसूरत फ़रेब शादी है,
फ़ितरत ए ग़म ही मुस्करा दी है.


– जिस तरह शादियों के लिए नसीब का हवाला देते हुए कहा जाता है कि जोड़ियां स्वर्ग से बन के आती हैं, यानी ‘मेड इन हैवन.’ वैसे ही किसी वेब सीरीज़ के सब एपिसोड एक ही बार में पूरे निपटा देना भी नसीब की बात है.

8 मार्च, 2019 को ही अमेज़न प्राइम पर रिलीज़ हो चुकी ‘मेड इन हैवन’ को देखने का अब वक्त मिला. और इसलिए इस रिव्यू में भी थोड़ी, I mean.. काफी लेट हो गई है. बहरहाल, देर आयद दुरुस्त आयद.


शादियों का इंडिया में एक अलग ही रूप देखने को आता है. पूरी दुनिया से अलहदा. यूनीक. ये लाखों करोड़ रुपयों की एक इंडस्ट्री बन चुकी है. और ‘मानसून वेडिंग’ से लेकर ‘हम आपके हैं कौन’ तक अलग-अलग जॉनर के देशी-विदेशी ऑडियो विजुअल कंटेंट इस कॉन्सेप्ट की थीम पर काम करके सफल हो चुके हैं. और नया-नया प्लेटफ़ॉर्म ‘ऑनलाइन स्ट्रीमिंग’ भी इससे अछूता नहीं रहा. पहले ‘बैंग बाजा बारात’ और अब – ‘मेड इन हैवन’. इसका नाम इसकी कहानी का एक हिंट आपको दे देता है.


ये कहानी शुरू होती है करण मेहरा (अर्जुन माथुर) और तारा खन्ना (सोभिता धूलिपाला) से. दोनों मिलकर एक वेडिंग प्लानिंग कंपनी चलाते हैं. सपना बहुत आगे जाने का है. लेकिन जैसे-जैसे ये आगे जाते हैं इन्हें मालूम चलता है कि वेडिंग प्लानिंग का बिजनेस, सिर्फ विवाह की व्यवस्थाएं करने का नाम ही नहीं है. बल्कि क्राइसिस मैनेजमेंट और नैतिकता के संकट का भी नाम है. सभी क्लाइंट ऐसे मिलते हैं जिनके साथ कुछ न कुछ नैतिक रूप से करप्ट होता है. रईस क्लाइंट्स की घिनौनी सच्चाइयां भी होती हैं. अब प्रश्न यह है कि क्या बिजनेस के लिए तारा और करण अपने सिद्धांतों से समझौता करते हैं या गलत के सामने उठ खड़े होते हैं. कड़ी दर कड़ी, नैतिकता से जुड़े यक्ष प्रश्न इन दोनों और दर्शकों के सामने आते जाते हैं.


तारा की बात करें तो वो शादीशुदा है. मशहूर धनपति आदिल खन्ना (जिम सरभ) से मैरिज की है. उसकी लाइफ का विरोधाभास ये है कि वो निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार में बड़ी हुई. इतने अभावों में कि मां ने ग्रूम किया इसी दिन के लिए कि किसी रईस से शादी कर सके और इस ‘गंदगी’ से बाहर निकल सके. तारा ने हमेशा अपने अतीत को अस्वीकार्यता से देखा है और आगे ही चली जा रही है. लेकिन आगे भी खुशी नहीं है. वहां तो और भी खराब स्थिति है.


अपने मन की उधेड़बुन वो सहेली फ़ैज़ा नक़वी (कल्कि केकलां) से साझा करती है. फ़ैजा भी सीरीज़ की अहम किरदार है. लेकिन उसे लेकर एक ऐसी शॉकिंग बात, बाद में तारा को पता चलती है कि दोनों का रिश्ता तकरीबन खत्म हो जाता है.


करण की भी अपनी परेशानियां हैं. एक तो सिर पर बहुत क़र्ज़ है जिसे चुकाने के लिए उसे लगातार वेडिंग प्लानिंग का काम करना ही है. दूसरा, वो गे है जिसके चलते बचपन के  स्कूल मेट्स से लेकर, अब मकान मालिक (विनय पाठक) तक, सब उसकी परेशानी का सबब बनते हैं. घर में पिता, मां से रिश्ता भी इस सच्चाई के चलते अलग-अलग रूप लेता है.


कहानी के कुछ प्रमुख पात्र तारा और करण की कंपनी ‘मेड इन हैवन’ के साथी भी हैं. इनमें एक है दिल्ली के निम्न-मध्यमवर्गीय घर से आने वाली जसप्रीत (शिवानी रघुवंशी). जो घर में अकेली कमाने वाली है. जवान भाई को ड्रग्स की लत है. दूसरा है कंपनी का ऑफिशियल फोटोग्राफर कबीर (शशांक अरोड़ा) है जो कई बार कहानियों में नरेटर का बन जाता है. तीसरी है शिबानी बाग्ची (नताशा सिंह) है जो कंपनी की स्टार परफॉर्मर है लेकिन (इसलिए) वो अपनी सैलरी से खुश नहीं है उसे अपनी बेटी के महंगे सपने पूरे करने है. शिबानी सैलरी हाइक के लिए करण से कहती भी रहती है. चूंकि शिबानी स्टार परफॉर्मर है तो ‘मेड इन हैवन’ की राइवल कंपनी हमेशा उसे अपने पाले में लाना चाहती है. 


ये सब वेडिंग प्लानर्स 9 एपिसोड्स में एक नई शादी और एक नए इवेंट को टैकल करते नजर आते हैं.

कहानी का आईडिया हो चुकने के बाद, अब अगर रिव्यू की बात करें तो मैं यही कहूंगा कि ये सीरीज़ बहुत लंबी है इसलिए इसमें ढेर सारे रेफरेंस और ढेर सारी पॉज़िटिव – नेगेटिव बातें निकल सकती हैं. हर किसी का ऑब्ज़र्वेशन बिलकुल अलहदा होते हुए भी बिलकुल करेक्ट हो सकता है. सुविधा के लिए यहां आपको 10 बातें बताता हूं जो मैंने ऑब्ज़र्व की हैं.


#  1 – दिल्ली के बैकड्रॉप में बनी इस सीरीज़ में ‘दिल्ली सिक्स’ वाली पुरानी दिल्ली नहीं है. वो दिल्ली नहीं है जिसकी बात गुलज़ार करते हैं, अपने गीत ‘कजरारे-कजरारे’ में. ये दिल्ली साउथ दिल्ली है. पॉश. अपर क्लास. लेकिन फिर भी आपको इसमें दिल्ली कम और दिल्ली वाले ज़्यादा देखने को मिलते हैं. यानी दिल्ली के बजाय कोई और शहर भी लिया होता तो भी कहने में कोई अंतर नहीं आना था.


नहीं. ये कोई अच्छी या बुरी बात नहीं है, लेकिन निजी तौर पर मुझे दिल्ली और उसके लोकेशंस, उसके रेफरेंस, उसकी लाइफस्टाइल देखने को ज़्यादा मिलतीं तो एक कनेक्शन सा लगता. जैसे ‘तितली’ में दिल्ली, ‘मुंबई मेरी जान’ में मुंबई और ‘कहानी’ में कोलकाता अपने सबसे उजले रंगों में था.


# 2 – जब हम किसी क्रिएटिव वर्क के किरदारों को इस तरह से जज करने लग जाते हैं, उनके बारे में राय बनाने लग जाते हैं (फिर चाहे वो अच्छी हो या बुरी) तो ये उस वर्क की सफलता को ही दर्शाता है. ये ठीक ऐसा ही है कि गेम ऑफ़ थ्रोन्स के बारे में डिस्कस करते हुए हम एक्टिंग, एडिटिंग, स्टोरीलाइन की डिस्कस करने के बजाय विन्टरफेल और किंग्सगार्ड के मैप को डिस्कस करने लगते हैं.


# 3 – हमने अतीत में कई बार ‘ग्रे’ शेड और लेयर्ड कैरेक्टर की बातें सुनी हैं. किरदारों का ये ‘मिलावटीपन’ इस सीरीज़ में अपने कुछ सबसे ‘शुद्ध’ रूपों में देखने में आता है. जैसे शिबानी बागची के किरदार को ही ले लीजिए. जब हम उसे अपने बॉस के सामने सैलरी बढ़वाने के लिए अड़ते और झगड़ते हुए देखते हैं तो उसे जज करने लगते हैं. लेकिन फिर उसकी पूरी सच्चाई जानकर हमें सैलरी को लेकर की गई उसकी जद्दोजहद जायज़ लगती है. ऐसे ही रूड सी दिखने वाली तारा हो या फ़ैज़ा नक़वी का साईकोटिक किरदार. हर कोई अपने-अपने स्तर पर ठीक उतने की धूर्त नज़र आते हैं जितना कोई रियल लाइफ में हो.


# 4 –  अपने ट्रीटमेंट में ये पूरी सीरीज़ बहुत मॉडेस्ट है, इसे देखते हुए आपको ‘विशालता’ का वैसा दंभ देखने को नहीं मिलेगा जैसा ‘सेक्रेड गेम्स’ या ‘मिर्ज़ापुर’ देखते हुए मिला था. जबकि इस सीरीज़ से भी जोया अख्तर, रसिका दुग्गल, कल्कि, नीना गुप्ता, विजय राज, विनय पाठक और दीप्ति नवल जैसे बड़े नाम जुड़े हुए हैं. अब यही अंदाज लगा लीजिए कि कल्कि का किरदार फ़ैज़ा नक़वी महत्वपूर्ण होते हुए भी लीड किरदार नहीं है. विजय राज और विनय पाठक का भी यही हिसाब किताब है. लीड किरदार तो दरअसल अर्जुन और तारा भी नहीं है. लीड किरदार है स्क्रिप्ट. जो समय और स्पेक्ट्रम, दोनों के लिहाज से फैली हुई होने के बावजूद कसी हुई है. उत्सुक करती है. आगे देखने के लिए प्रेरित करती है.


# 5 – सीरीज़ के ज़्यादातर किरदार उच्च वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए उनके तौर तरीकों से, उनकी खुशियों, उनकी दिक्कतों से मुझ जैसा आम आदमी पूरी तरह कनेक्ट नहीं फील करता. कुछ निम्न वर्ग से आए किरदारों को भी निर्देशक ने दूरबीन से देखा है. उनकी गरीबी दिखाने के लिए वो सब यूज़ किया गया है जो अब क्लीशे हो चला है. जैसे जसप्रीत कौर का किरदार जो अपने कलीग को दिखाने के लिए गाड़ी से एक बड़े से अपार्टमेंट के सामने उतरती है, न कि अपने साधारण से मकान के.


# 6 – कई अन्य चीज़ें, कॉन्सेप्ट और जगहें भी हैं जहां पर दर्शक एक मीडियोकर और ‘घिसा-पिटा’ मसाला पाते हैं. होने को कई चीज़ें नई और शॉकिंग भी हैं लेकिन ये सब शॉक, ये सब नवीनता सीन के स्तर पर हैं ओवरऑल कॉन्सेप्ट के स्तर पर नहीं. कई जगह एक टेंपलेट की तरह चीज़ें यूज़ कि गई हैं, जिसे सेफ प्ले कहा जा सकता है. जैसे होमोसेक्शुअलटी. सीरीज़ के विशालकाय रनिंग टाइम के चलते भी है, जिसके हर मोमेंट में प्रयोग करना या कुछ नया करना न केवल एक मैमथ काम हो जाता बल्कि साथ ही दर्शक भी उससे नहीं कनेक्ट कर पाते.


[मुझे लगता है कि प्रयोगों के मामले में भी वही बात सत्य है जो कि भाषा के मामले में है. यानी जिस तरह नए शब्द को समझाने के लिए उसके इर्द-गिर्द जाने पहचाने शब्द होना ज़रूरी हैं, ठीक वैसे ही एक दो क्रिएटिव चीज़ें दर्शकों के लिए ग्राह्य हो सकें, उसके लिए आस पास ढेर सारे क्लीशे होने ज़रूरी हैं.]


# 7 – ‘मेड इन हैवन’ की सबसे अच्छी बात ये है कि ये हमारे समाज के दोहरेपन को उजागर कर देती है और बड़ी क्रूरता से उन दोहरेपन का जवाब दिए बिना ही आगे बढ़ जाती है. जैसे विदेश से आई एक फैमिली मंगल दोष को मिटाने के लिए लड़की वालों से लड़की की शादी पहले पीपल के पेड़ से करने को कहती है. उनका कारण (जो दरअसल एक बहाना लगता है) ये है कि, बेशक ऐसा न करने से  कुछ न होता हो, लेकिन करने से क्या ही नुकसान हो जाएगा.


# 8 – दहेज + अपर क्लास, यौन शोषण + अपर क्लास, अंधविश्वास + अपर क्लास, ऑनर किलिंग + अपर क्लास, वर्जिनिटी + अपर क्लास, एनआरआई शादी + अपर क्लास –  ये 9 एपिसोड्स में से कुछेक की थीम हैं. आपको कहीं-कहीं सीरीज़ को देखकर लगेगा कि ये एपिसोड रियल घटनाओं से प्रेरित हैं, और ऐसे केसेज़ आपने रियल में भी देखे या सुने हैं. मुझे खुद भी ये सब देखते हुए कई हाई-प्रोफ़ाइल केसेज़ याद हो आए.


[जब पेज थ्री वालों की कोई खबर छपती है तो वो फ्रंट पेज में छपती है.] 

# 9 – ऐसे कितने ही वाकये हैं जहां पर एक दर्शक के तौर पर हम जवाब चाहते हैं, हल चाहते हैं, एक अंतिम परिणति चाहते हैं, लेकिन सीरीज़ ऐसा कोई प्रयास नहीं करती. उदाहरण के तौर पर उस लड़की की बात की जा सकती है जो मोलेस्ट हुई है लेकिन पैसों के चलते चुप रहना स्वीकार करती है. और दुखद रूप से आपको उसका स्टैंड सही भी लगता है.


एक और उदाहरण – लीड कैरेक्टर जो कि गे है, बचपन में जब फंसता लगता है तो अपनी जगह अपने दोस्त को बलि का बकरा बना देता है. और हमें दोस्त पर दया तो आती है लेकिन लीड (करण मेहरा) पर गुस्सा नहीं आता.


# 10 – जब हम सीरीज़ देखना शुरू करते हैं तो ‘लड़का + लड़की + वेडिंग प्लानर कंपनी’ वाले कॉन्सेप्ट के चलते हमारे मन में ‘बैंड बाजा बारात’ की याद ताज़ा हो उठती है. लेकिन एक एपिसोड, बल्कि कुछ ही मिनटों में पता चल जाता है कि ये सीरीज़ ट्रीटमेंट से लेकर कॉन्सेप्ट के स्तर तक कहीं भी ‘बैंड बाजा बारात’ का ‘एक और वर्ज़न’ नहीं है.


# 11 – अंततः बिना स्पॉइलर के बताएं तो ‘मेड इन हैवन’ का क्लाइमैक्स दरअसल दुखों की सर्द रातों में, उम्मीद की एक जलती चिंगारी छोड़ के जाने सरीखा है. और हम एक दर्शक के रूप में उम्मीद रखते हैं कि किरदारों ने शायद आग जला ली होगी, सर्द रात काट जाएगी.


वैसे जाते-जाते आपको एक दूसरा स्पॉइलर दे देते हैं  – सूत्रों, वो जहां कहीं भी होते हैं और जो भी होते हैं, की मानें तो ज़ोया अख्तर ने इसके दूसरे सीज़न पर काम करना शुरू भी कर दिया है.