डिजिटल रिव्यू: जामताड़ा - सबका नंबर आएगा (वेब सीरीज)
कलाकार: स्पर्श श्रीवास्तव, अंशुमान पुष्कर, अक्षा परदसानी, दिव्येंदु भट्टाचार्य, अमित सियाल, मोनिका पंवार. पूजा झा आदि।
निर्देशक: सौमेंद्र पाधी
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: **
पिछले साल सैक्रेड गेम्स 2 और बार्ड ऑफ ब्लड जैसी कमजोर वेब सीरीज से भारतीय दर्शकों को मोटा चूना लगा चुकी अमेरिकी वीडियो स्ट्रीमिंग कंपनी नेटफ्लिक्स के इरादे नए साल में भी बेहतर होते नजर नहीं आते। नेटफ्लिक्स का एक सेट पैटर्न बनता जा रहा है। वेब सीरीज की रिलीज से पहले इसे लेकर खूब शोर मचाना और फिर एक कमजोर कहानी पर बनी औसत से भी खराब वेबसीरीज रिलीज करके शांत हो जाना। फिल्म इंडस्ट्री में चर्चा ये भी है कि नेटफ्लिक्स इन दिनों दोनों हाथों से कंटेंट बटोर रहा है लेकिन इसकी गुणवत्ता परखने वाला इनके मुंबई दफ्तर में कोई नहीं है। जामताड़ा नेटफ्लिक्स के हिंदी कंटेंट पर घोस्ट स्टोरीज के बाद इस साल का दूसरा कलंक है।
जामताड़ा की कहानी जैसी ही इस सीरीज की नेटफ्लिक्स पर रिलीज की कहानी है। ये भी दर्शकों से एक तरह की फिशिंग से कम नहीं है। ओटीटी वूट के लिए टिपिंग फिल्म्स ने जो भी कंटेंट बनाया, वह अपने घर में ही नकार दिए जाने के बाद नेटफ्लिक्स पर परोस दिया है। 20 से लेकर 25 मिनट के छह एपीसोड यानी गणित लगाकर देखें दो—ढाई घंटे की एक फिल्म यानी न बिक सकी एक फिल्म को वेब सीरीज बनाकर खपा दिए जाने के भी आशंका इस वेब सीरीज को देखकर बनती है। 20 मिनट के एपीसोड में तीन मिनट के एंड क्रेडिट्स भी एक रिकॉर्ड से कम नहीं है।
जामताड़ा की कहानी युवा और बाल अपराधियों की कहानी है। फोन पर लड़कियों की तरह बात करके लोगों के क्रेडिट या डेबिट कार्ड नंबर पूछना और फिर सीवीवी के अंक मांग लेना और फिर मोबाइल पर आने वाला ओटीपी। जामताड़ा के किशोरों ने दो तीन साल पहले पूरे देश के दर्जनों लोगों को ऐसे ही लूट लिया। साल 2020 में ये किस्सा सबको पता है। सबको ये भी पता है कुछ भी हो जाए फोन पर किसी को अपनी सीवीवी नंबर या ओटीपी नहीं बताना है। इस लिहाज से ये बेव सीरीज कालबाधित यानी कि आउटडेटेड हो चुकी है।
बुधिया सिंह बॉर्न टू रन फिल्म बना चुके सौमेंद्र पाधी की कहानी बस किशोरों के झुंड में फंसी रहती है। जामताड़ा के बारे में ये फिल्म ज्यादा कुछ नहीं बताती। भाइयों के बीच की अदावत, महिला आईपीएस की अपने ही विभाग में चलने वाली मशक्कत और एक महिला शिक्षक की इन किशोरों से मिलीभगत। इन तीन कथा सूत्रों को पकड़ के चलने वाली ये वेब सीरीज अंत तक आते आते हांफ जाती है। तब तक देखने वाले का ठीक ठाक टाइम खराब हो चुका होता और नेटफ्लिक्स को हर महीने पैसे देने की याद आते ही मूड भी खराब होना शुरू हो चुका होता है।
