क्रिकेट को जिस देश में धर्म माना जाता हो वहां इस मुद्दे पर बनी सीरीज काफी एक्साइट करती हैं. लेकिन 'सलेक्शन डे' की सबसे बड़ी कमी है इसकी सुस्त रफ्तार और चौंकाने वाले एलिमेंट की कमी...
मुल्क की आबादी 125 करोड़ से ज्यादा और भारतीय क्रिकेट टीम में केवल 11 खिलाड़ियों के लिए जगह. लेकिन रुतबा बॉलीवुड स्टार और बड़े नेताओं जैसा. ऐसे में हर शख्स टीम इंडिया का हिस्सा बनने का ख्वाब देखता है. कुछ इसी सपने को नींव में रखकर तैयार हुई है नेटफ्लिक्स की नई वेब सीरीज 'सलेक्शन डे.' क्रिकेट पर इससे पहले अमेजन प्राइम पर 'इनसाइड एज' नाम से सीरीज आ चुकी है, जिसका प्लॉट आईपीएल के इर्दगिर्द बुना गया था. इसके अलावा इकबाल, लगान, चमत्कार, विक्ट्री, स्टंप्ड जैसी फिल्में भी क्रिकेट पर आधारित रही हैं.
'सलेक्शन डे' में क्रिकेट की चाशनी के जरिए एक पिता की अपने बेटों को आला दर्जे का क्रिकेटर बनाने की जिद, एक स्कूल के जिंदा रहने की लड़ाई, पिता की महत्वाकांक्षा तले दबे एक बच्चे की कश्मकश और घरेलू हिंसा के दंश को पिरोया गया है. यह सीरीज अरविंद अडिगा के 'सलेक्शन डे' नाम के उपन्यास पर आधारित है जिसका निर्देशन भारतीय मूल के उद्यन प्रसाद ने किया है. 'सलेक्शन डे' के पहले सीजन में लगभग आधे-आधे घंटे के कुल छह एपिसोड हैं.
प्लॉट :-
कहानी दो भाइयों राधा और मंजू कुमार की है. पिता मोहन कुमार पर अपने दोनों बेटों को दुनिया का नंबर एक और दो बल्लेबाज बनाने की धुन सवार है. इसके चलते वह खुद ही उनके अभ्यास, खाने-पीने, सोने-जागने और रनों का हिसाब किताब रखता है. उसका एकमात्र सपना अपने दोनों बेटों को भारतीय टीम में खिलाना है. गांव से यह कहानी मुंबई पहुंचती है जहां मोहन मुंबई की अंडर-19 टीम के जरिए अपने बेटों को पेशेवर क्रिकेट में प्रवेश दिलाने के लिए जद्दोजहद करता है. मोहन के छोटे बेटे मंजू को क्रिकेट पसंद नहीं है और वह हर मौके पर इस बात को दोहराता है. उसे विज्ञान पसंद है.
मोहन को राधा-मंजू से काफी उम्मीदें भी हैं और क्रिकेट को लेकर वह काफी जज्बाती भी है. इसका एक उदाहरण देखिए, मोहन बड़े बेटे राधा को चैंपियन नंबर वन और छोटे मंजू को चैंपियन नंबर टू कहता है. दोनों भाई आपस में भी इसी तरह से बात करते हैं.
क्रिकेट को जिस देश में धर्म माना जाता हो वहां पर इस मसले पर बनी सीरीज काफी एक्साइट करती हैं. लेकिन 'सलेक्शन डे' की सबसे बड़ी कमी है इसकी सुस्त रफ्तार और चौंकाने वाले एलिमेंट की कमी. छह एपिसोड में कई मौके ऐसे आते हैं जहां दर्शक पहले से जान जाते हैं कि आगे क्या होना है. जैसे मुंबई में टॉमी सर का मिलना, चॉल से बाहर निकलना, मोहन का कुत्ते की रखवाली का काम. अलग-अलग सिरों का एक ही जगह पर जाकर मिलना भी कहानी को धीमा करता है. आनंद मेहता वाला प्लॉट काफी बार इस्तेमाल हो चुका है और सबसे कमजोर कड़ी वही लगता है.
'सलेक्शन डे' में ऐसे कई मौके भी हैं जो बांधे रखते हैं. जैसे मंजू और भगवान सुब्रमण्यम का संवाद, मंजू और जावेद के साथ वाले दृश्य, मोहन कुमार की क्रिकेट की दीवानगी आदि. हालांकि फिल्म के डायलॉग अंग्रेजी में लिखे गए हैं और फिर उन्हें जरूरत के हिसाब से हिंदी व मराठी में बदला गया है. इस वजह से न तो क्रिकेट वाला जोश नजर आता है और मुंबईया माहौल.
अभिनय :-
मंजू का किरदार निभाने वाले मोहम्मद समद इस सीरीज की जान है. पिता की जिद और मां की चिंता के बीच झूलते हुए मंजू के किरदार में समद काफी सहज नजर आए हैं. वे जब भी स्क्रीन पर आते हैं तो नजर हटाने का मन नहीं करता. वे इसी साल आई हॉरर-थ्रिलर 'तुम्बाड' में भी दिखे थे. मंजू में हर वह व्यक्ति अपनी छवि ढूंढ सकता है जिसने घरवालों के दबाव में अपनी पसंद के कॅरियर को भुला दिया हो. वे 'थ्री ईडियट' के फरहान(माधवन) के किरदार की याद दिलाते हैं. बड़े बेटे राधा की भूमिका में यश धोल्ये के पास ज्यादा कुछ करने को है नहीं.
महत्वाकांक्षी और सनकी पिता की भूमिका में राजेश तैलंग छा गए हैं. क्रिकेट की दीवानगी में वे जिस तरह से निर्दयी और अपने बेटों को नंबर वन बनाने में सनकी नजर आए हैं वह आप भूल नहीं पाएंगे. उनके पैंतरे, जुगाड़ और हद से आगे बढ़ जाने की ललक बांधे रखती है. आप उनसे नफरत करने लगते हैं लेकिन जूस से भरी टंकी को बीएमसी अधिकारी द्वारा गिरा देने के सीन में वे आपसे सहानुभूति भी बटोर लेते हैं.
प्रिंसिपल के किरदार में रत्ना पाठक शाह काफी अच्छी लगी हैं. वे जब भी स्क्रीन पर आती हैं तो ऐसा लगता है मानो गर्मी और उमस भरे दिन में कहीं से कोई ठंडी हवा का झोंका आया है. टॉमी सर के रोल में महेश मांजरेकर छाप नहीं छोड़ पाए. कैंसर से जूझ रही बीवी और क्रिकेट में फिर से खुद को स्थापित करने के बीच वे दर्शकों को लुभा नहीं पाते. ऐसा लगता है मानो किसी शेफ को शिकारी बना दिया गया हो.
पहले सीजन का एंड जिस तरह से हुआ है वह आपको इसके अगले हिस्से को लेकर उत्सुक बनाए रखता है. 'सलेक्शन डे' के पहले सीजन में कई किरदार पूरी तरह से खुलकर सामने नहीं आ पाए हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले सीजन में अभी छूट गए हिस्सों को जोड़ा जाएगा. कुल मिलाकर कहा जाए तो क्रिकेट के दीवाने भारत को अभी भी एक बेहतरीन क्रिकेट बेस्ड फिल्म/वेब सीरीज का इंतजार रहेगा. पहले सीजन के लिए क्रिकेट की भाषा में कहा जा सकता है कि इसका प्रदर्शन वैसा ही रहा जैसा कि भारतीय क्रिकेट टीम का प्रदर्शन विदेशी पिचों पर रहता है.
हर बार उम्मीद रहती है कि इस बार टीम जीतकर लौटेगी लेकिन निराशा हाथ लगती है. हालांकि अभी विराट कोहली की टीम ऑस्ट्रेलिया में जीत के मुहाने पर है तो उम्मीद है कि दूसरा सीजन भी वैसा ही कुछ करेगी ।
